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Sunday, August 17, 2008

शिखंडी सरकार के मुंह पर तमाचा?


शुक्रवार को जहां सारा देश स्वतंत्रता दिवस की 62वीं सालगिरह मना रहा था, वहीं कश्मीर घाटी में केंद्र सरकार के मुंह पर कालिख पोतते हुए अलगाववादियों ने पाकिस्तानी झंडे फहराए। केंद्र की मनमोहन सरकार ने इस मामले पर जिस तरह से शिखंडी रवैये का परिचय दिया है, इससे करोड़ों हिंदुस्तानियों का सिर शर्म से झुक गया है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जिस ऐतिहासिक लाल चौक पर 60 साल पहले बड़ी शान से तिरंगा फहराया था, शुक्रवार को वहीं पर अलगाववादियों ने भारत सरकार को तमाचा मारते हुए पाक ध्वज फहराए। यह सब कुछ उस समय हुआ जब पूरा देश स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मना रहा था।घाटी के हर मस्जिद से शुक्रवार को भारत विरोधी नारे लगाए जाते रहे और दिल्ली के लाल किला से हमारे पीएम मिमियाते रहे। शुक्रवार को घाटी में जो कुछ भी हुआ इसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि कश्मीर भारत का हिस्सा है। पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बल शांत होकर राष्ट्रविरोधी तत्वों का तमाशा देख रहे थे।जुमे की नमाज के बाद तो अलगाववादियों ने जुलूस निकाल कर जम कर हिंदुस्तान को कोसा। इन नमकहरामों ने 'हम क्या चाहते-आजादी, यहां क्या चलेगा-निजाम-ए-मुस्तफा, भारत के आईवानो को-आग लगा दो, पाकिस्तान से नाता क्या-लाइल्लाह लिलल्लाह, जीवे-जीवे पाकिस्तान' के नारे भी लगाए गए। लेकिन इन्हें रोकने वाला कोई नहीं था। विडंबना यह है कि देश के अन्य राज्यों में अगर ऐसी कोई घटना सामने आती है तो उसे गिरफ्तार कर उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दायर हो जाता है। सवाल यह उठता है कि यहां सरकार की यह दोगली नीति कब तक चलेगी। कश्मीर घाटी में हाल ही में अलगाववादी नेताओं ने नियंत्रण रेखा पार करने की कोशिश की लेकिन उनके खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं दर्ज हुआ। आखिर यह देश कब तक राजनेताओं के दोगलेपन का खामियाजा भुगतता रहेगा? आखिर कब तक?

Saturday, July 26, 2008

सेक्स बनाम संचार क्रांति भाग-1


पहले मै आपको एक किस्सा सुनाता हूं। आज से करीब पंद्रह साल पुरानी बात है। टीवी पर उन दिनों परिवार नियोजन का एक विज्ञापन आता था। तब हमारे यहां पूरे परिवार के साथ टीवी देखने का चलन था। जैसे ही वह विज्ञापन आने को होता, मेरे दादा जी मुझे पानी लाने के बहाने कमरे से बाहर भेज देते। मुझे ताज्जुब होता कि दादा जी को रोज एक निश्चित समय पर ही प्यास क्यों लगती है। बाद में मुझे अपने दोस्तों से पता चला कि उस समय परिवार नियोजन का विज्ञापन आता था। लेकिन अब यह बीती बात हो गई है। अब तो दादा जी खुद विज्ञापन में बच्चों को समझाते नजर आ सकते हैं कि एड्स से बचाव के लिए सुरक्षित सेक्स कितना जरूरी है। फिल्म खुद्दार में करिश्मा कपूर पर 'सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोले' गाना फिल्माया गया तो हंगामा मच गया। गाने पर बैन लगा और 'सेक्सी-सेक्सी' की जगह 'बेबी-बेबी' करना पड़ा। डेढ़ दशक में ऐसा बदलाव आ गया कि अमिताभ की चीनी कम में आठ साल की एक बेबी का नाम 'सेक्सी' है। पर यह सिर्फ फिल्मों की बात नहीं है, संचार क्रांति के साथ-साथ पूरे समाज में सेक्स क्रांति आ चुकी है। सेक्स की खुले आम चर्चा कभी वर्जित रही होगी लेकिन आज सेक्स शायद हमारी दैनिक बातचीत का हिस्सा बन गया है। वह जमाना और रहा होगा, जब लोग डॉक्टर से भी सेक्स के बारे में संकोच के साथ बात करते थे। आज सब कुछ खुला और साफ है।

सेक्सोलॉजिस्ट डॉ पी के जायसवाल से एसएमएस द्वारा ऑनलाइन प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में पूछे गए इस सवाल को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि सेक्स चर्चा अब कितनी ओपेन है। सवाल अंग्रेजी में था, मै यहां उसका शालीन भावार्थ दे रहा हूं-मैं 24 वर्षीय युवती हूं। मैं जानना चाहती हूं कि सेक्स क्षमता बढ़ाने के लिए क्या कोई दवा है? मेरे ब्वॉयफ्रेंड ने सब-कुछ आजमाकर देख लिया। मैं आपसे मदद चाहती हूं कि आप मुझे कुछ अच्छी टैबलेट्स बता दीजिए जिससे ।। धन्यवाद। पंद्रह साल पहले पोते को पानी लाने भेजकर परिवार नियोजन का विज्ञापन न देखने देने वाले दादा जी अब इस पोते या पोती का क्या करेंगे?

एक के साथ एक फ्री की तरह संचार क्रांति के साथ-साथ सेक्स क्रांति भी भारत को उपहार में मिली है। जो लड़के -लड़कियां आपस में सेक्स की चर्चा करने में संकोच करते थे वे बिना हिचक नॉनवेज जोक्स एसएमएस करने लगे। रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी। एसएमएस में तो थोड़ा संकोच भी रहता है, क्योंकि उससे आपकी पहचान जुड़ी होती है, लेकिन इंटरनेट पर आप पहचान छुपाकर आसानी से सेक्सी चैट कर सकते हैं। यहां न कोई पहचान है न कोई बंधन, इसलिए बातें भी खुल्लमखुल्ला होती हैं। पर जरूरी नहीं कि वहां जो जवाब दिए जा रहे हैं वे सही ही हैं। कई बार तो लड़के -लड़की बनकर और लड़कियां लड़का बनकर चैट करती हैं। पर ये फैंटेसी की दुनिया है और इसका निर्मल आनंद लेने वाले इस चक्कर में नहीं पड़ते कि जिसे वे लड़की समझ के बात कर रहे हैं, वह भी उन्हीं की तरह कोई लड़का है। वैसे इस दुविधा से मुक्त करने की सुविधा भी बाजार ने उपलब्ध करा दी है। रसीली बातें, मजेदार बातें शीर्षक से टेलीफ्रेंडशिप के तमाम विज्ञापन छपते हैं, जिनमें दिए गए नंबर पर डायल करके आप अपना मन और जेब दोनों हलके कर सकते हैं। अब जमाना विजुअल का है इसलिए सिर्फ आडियो से काम नहीं चल सकता, बाजार इस बात को अच्छी तरह जानता है। ब्लू फिल्मों का ट्रेंड तो काफी पहले से है। लेकिन ब्लू सीडी खरीदने के लिए आपको वीडियो पार्लर तक जाना होता था। इसमें भी संकोच होता था। संकोच सेक्स बाजार का सबसे बड़ा दुश्मन है, लिहाजा यह हर तरह का संकोच मिटा देना चाहता है। आपके छोटे से संकोच के खिलाफ अनगिनत पोर्न साइट्स हाजिर हैं। आप अपना कंप्यूटर ऑन कीजिए, सेक्सी-दुनिया आपका मनोरंजन करने को हाजिर है।

पर, जिस संस्कृति में पति-पत्नी अपने शयनकक्ष में भी दिया बुझाकर ही प्रेम करते थे, उसने क्या यूं ही सेक्स-बाजार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया? प्रतिरोध हुआ है पर बदलाव की लहर इतनी तेज थी कि तटबंध भी साथ में बह गए। ऊपर में जो मैने दादा जी वाला किस्सा बताया है, भारत में सेक्स-बूम की शुरूआत भी उसी दौर से होती है। जिस कपूर परिवार में लड़कियों को फिल्मों में काम करने की छूट नहीं थी, उसी की एक बेटी करिश्मा कपूर ने जब खुद्दार फिल्म में 'सेक्सी-सेक्सी मुझे लोग बोलें' गाया तो हड़कंप मच गया। गाने को बैन कर दिया गया तो इसे 'बेबी-बेबी मुझे लोग बोलें' करके रिलीज किया गया। हालांकि अभी भी सेक्सी-सेक्सी वाला वर्जन सुनने को मिलता रहता है। करिश्मा ने तो खुद को ही सेक्सी कहा था, लेकिन गो¨वदा तो उनसे भी दो कदम आगे बढ़कर अपनी पैंट और शर्ट को भी सेक्सी बताने लगे। इसके बाद सेक्स की जो आंधी चली उसमें प्रतिरोध के दरख्त उखड़ गए। चौदह साल पहले 'सेक्सी' को 'बेबी' बनना पड़ा था, आज बेबी को सेक्सी बना दिया गया। अमिताभ बच्चन की फिल्म चीनी कम में सात-आठ साल की एक बच्ची स्वीनी खैरा का नाम 'सेक्सी' रखा गया है। सेक्सी होना अब एक खिताब है। हाल ही में बिपाशा बसु को एशिया की सबसे सेक्सी महिला और शाहरुख को सबसे सेक्सी पुरुष का दर्जा मिला तो इनके भाव बढ़ गए। क्रमश:.....

Friday, March 7, 2008

बिहारी होने की इतनी बड़ी सजा


क्या किसी को बिहारी होने की इतनी बड़ी सजा दी जा सकती है..की उसके दोनों हाथ कट डाले जाय..आखिर राज ठाकरे के गुंडों को किसने ये हक़ दे दिया की वो किसी गरीब, बेबस और मजबूर को सिर्फ़ इस लिया सजा दे की वो बिहारी या भइया है..कहा है इस देश का कानून, बड़ी-बड़ी बात करने वाले ब्रस्त नेता...शायद सबकी आत्मा मर चुकी है...आइए जानते है उस बेबस, लाचार की दास्ताँ....

मैं रोज की तरह भुजा बेच कर रात को करीब 10 बजे फुटपाथ पर ही सोने चला गया। अभी मेरी आंख लगी ही थी कि मनसे के सैकड़ों कार्यकर्ता मुझे घेर कर पिटने लगे, मैं उनके पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाने लगा, बावजूद मेरी लात-घूसों से पिटाई होती रही और मैं बेहोश हो गया। दूसरे दिन जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को अस्पताल में पाया। मेरे दोनों हाथ मनसे कार्यकर्ताओं ने काट लिए थे और मेरे हाथों पर पट्टियां बंधी थीं। यह दर्दनाक दास्तां उस गरीब किशुन का है, जिसे बिहारी होने की इतनी बड़ी सजा दी गई है। पिछले दिनों राज ठाकरे व उसके समर्थकों द्वारा उत्तर भारतीयों पर बरपाए गए कहर का शिकार हुआ किशुन। मनसे कार्यकर्ताओं ने निर्ममतापूर्वक उसके दोनों हाथ काट कर दरिंदगी का परिचय दिया है। बिहार के सिवान जिले के रघुनाथपुर थाना क्षेत्र के दुदही गांव निवासी किशुन सिंह की गलती सिर्फ इतनी है कि वह पिछले 10 वर्र्षो से अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए महाराष्ट्र के पुणे में भुजा बेचता था। दिनभर भुजा बेच कर रात में फुटपाथ पर ही सो कर जिंदगी गुजारने वाले किशुन को क्या पता था कि उसे इसकी कीमत अपने दोनों हाथ गवां कर चुकानी पड़ेगी। घर लौटे किशुन के चेहरे पर मनसे कार्यकर्ताओं का खौफ इस कदर गहरा गया है कि आज भी वह किसी अंजान व्यक्ति को देख कर कांप जाता है।

सिवान के सदर अस्पताल में अपना इलाज करवा रहा किशुन को इस बात की चिंता सता रही है कि वह अपनी 12 वर्षीय बिटिया रंजीता का हाथ कैसे पीला करेगा। साथ ही उस आठ वर्षीय पुत्र और उसकी पत्‍‌नी का क्या होगा। इस परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा।

Thursday, February 21, 2008

भाई मैं मुंबई क्यों छोड़ूं ?


भाई चाहे राज ठाकरे कहें या उनके ताऊजी बाला साहेब मैं तो मुंबई से हटने के मूड में एकदम नहीं हूँ..... मैं ठहरा आख़िर बिहारी ...मैं ही नहीं मेरे सभी दोस्त, मेरा परिवार, सभी सदस्य ऐसा ही सोचते हैं...लेकिन हम सब और खास कर मैं किसी राज ठाकरे या उसके गुंड़ों से मार ही खाने के लिए तैयार हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे पास कोई फौज नहीं है न ही कोई समर्थकों का गिरोह ही। मैं तो अभी तक यहाँ का मतदाता भी नहीं हुआ हूँ...बस रह रहा हूँ और आगे भी ऐसे ही रहने का मन है.....जो लोग मुंबई को अपना कहने का दंभ दिखा रहे हों...वो सुन लें... कभी भी अगर बीमार न रहा होऊँ तो 15 से 17 घंटे तक काम करता हूँ...इतनी ही मेहनत हर उत्तर भारतीय यहाँ करता है...वे या मैं किसी भी राज या नाराज ठाकरे या उनके मनसे के किसी गुंडों से कम महाराष्ट्र या मुंबई को नहीं चाहते हैं... अगर उनके पास कोई राज्य भक्ति को मापने का पैमाना हो तो वे नाप लें अगर उनसे कम राज्य भक्त निकला तो खुशी से वापस बिहार चला जाऊँगा....लेकिन अगर मेरे मन में कोई खोट नहीं है और मैं एक अच्छे शहरी की तरह मुंबई को अपना मानता हूँ तो मैं अपनी हिफाजत के लिए गोलबंद होने की आजादी रखता हूँ....अगर हमें खतरा लगा तो बाकी भी खतरे में ही रहेंगे...क्योंकि तोड़- फोड़ के लिए बहुत कम हिम्मत की जरूरत होती है....लूट और आगजनी से बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती....रास्ते में जा रहे या किसी चौराहे पर किसी टैक्सी वाले को उतार कर पीटना और उसके रोजीके साधन को तोड़ देना तो और भी आसान है....मैं यह सब कायरता भरा कृत्य करने के लिए गोलबंद नहीं होना चाहूँगा बल्कि मैं ऐसे लोग का मुँह तोड़ने के लिए उठने की बात करूँगा जो हमें यहाँ से हटाने की सोच रहे हैं....मेरा दृढ़ मत है कि उत्तर भारत के ऐसे लोगों को आज नहीं तो कल एक साथ आना होगा .....उत्तर भारतीयों को एक उत्तर भारतीयों को सुरक्षा देने वाली मनसे के गुंड़ो को मुहतोड़ उत्तर देने वाली उत्तर सेना बनाने के वारे में सोचना ही पड़ेगा....जो लोग आज भी मुंबई में अपनी जातियों का संघ बना कर जी रहे हैं....मैं उन तमाम जातियों को अलग-अलग नहीं गिनाना चाहूँगा....उत्तर भारत से बहुत दूर आ कर भी आज भी बड़े संकीर्ण तरीके से अपने में ही सिमटे हुए लोगों से मैं कहना चाहूँगा कि ...आज जरूरत है सारे उत्तर भारतीयों को एक साथ आने की जिन्हें यहाँ भैया कह कर खदेड़ा जा रहा है....उनमें अमिताभ बच्चन भी हैं जो कि अभिनय करते हैं...और शत्रुघन सिन्हा भी, उनमें हसन कमाल भी हैं...जो कि लिखते हैं...और निरहू यादव भी, जो कि सब कुछ करते हैं.........उनमें राम संतलाल पाल भी हैं जो किताब बेंचते हैं और सुंदर लाल भी जो कि कारपेंटर हैं...जिनका दावा है कि हम काम न करें तो मुंबई के आधे घर बिना फर्नीचर के रह जाएँ......तो आज नही तो कल होगा.....संसाधनों के लिए दंगल होगा....और इसके लिए तैयार रहने को मैं कायरता नहीं मानता। ऐसा मैं अकेला ही नहीं सोच रहा ऐसे लाखों लोग हैं जो अपनी मुंबई को छोड़ने के बदले लड़ कर मरना बेहतर समझेंगे। आप भी तैयार रहिया ...

Saturday, February 9, 2008

राज का गुंडाराज,किसकी मुम्बई!


मुंबई में जो हो रहा है, उस पर कौन गर्व कर सकता है?

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे ने मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ मोर्चा खोलकर और क्षेत्रीय संकीर्णता के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल कर एक ऐसे विवाद को जन्म दिया है जो हमारे देश के संघीय ढांचे पर कुठाराघात करता है।
बिहारियों द्वारा छठ पर्व मनाए जाने को नाटक करार देने और बिग बी अमिताभ बच्चन के उत्तरप्रदेश प्रेम पर ताने कसने के राज के कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए कम है। क्षेत्रीय संकीर्णता के इस विषधर को समय रहते कुचल डालने में ही देश का भला है अन्यथा इसका जहर फैलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
राज ठाकरे के ऐसा करने का मकसद मराठी भाषी वोट बैंक को अपनी पार्टी के साथ जोड़ना है, पर मराठी समाज उनके इस संकीर्ण नजरिये के समर्थन में उठ खड़ा हो इसकी संभावना नही है। राज के चाचा बालासाहेब दशकों से संकीर्ण महाराष्ट्रवाद की राजनीति करते रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता में उनकी पार्टी तभी भागीदार बन पाई जब उसने भाजपा सरीखी राष्ट्रीय पार्टी से हाथ मिलाया। वही शिवसेना को भी अपना रुख बदलना पड़ा..बालासाहेब की शिवसेना से अलग होकर राज ने अपनी जो नई राजनीतिक दुकान खोली है वह तमाम जतन करके भी न तो कोई साख बना पाई है और न जनाधार ही। शायद इसी से हताश हो कर राज ने उत्तर भारतीयों पर हमला बोला है जो भोथरा होने के साथ ही समाज को बांटने वाला भी है।
सुरक्षा संबंधी कारणों को छोड़ दें तो देश के नागरिक देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने, रोजी-रोटी कमाने और अपनी रीतियों-परंपराओं का पालन करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह उनके संविधान प्रदत्त मूल अधिकारों का हिस्सा है। मुंबई में बिहारियों द्वारा छठ पूजा करने को नाटक बताकर राज ने वहां रहने वाले बिहारियों के मूल अधिकारों को चुनौती दी है।
अमिताभ बच्चन के उत्तरप्रदेश प्रेम पर उनकी तानाकशी भी इसी दायरे में आती है। बिहारियों को मुंबई में छठ पूजा करने का उतना ही हक है जितना कि महाराष्ट्रियनों को देशभर में गणोशोत्सव मनाने का।

राज ठाकरे अगर वास्तव में मुंबई के विकास के प्रति उत्सुक हैं तो उन्हें अपना ध्यान छठ पूजा से हटाकर प्रशासन की खामियों पर केंद्रित करना होगा। पटना या गोरखपुर से आने वाली रेलगाड़ियों को तो नहीं रोका जा सकता है। अगर रोका जा सकता है तो वह है राजनीतिक भ्रष्टाचार का अजगर जिसने मुंबई के शरीर को तो चपेट में ले ही लिया है, अब उसकी आत्मा को भी डसने की फिराक में है। मगर राज तो गुंडागर्दी करके अपनी राजनितिक रोटी सकना चाहते है। जिस पर रोक लगना चाहेया

Tuesday, January 22, 2008

छः साल खौफ के साए में......


मुंबई की एक अदालत ने 2002 में गुजरात दंगों के दौरान बिलक़ीस बानो के साथ बलात्कार मामले में 11 लोगों को उम्र क़ैद की सुनाई , हालाँकि अपराध की जघन्‍यता के बरक्‍स यह सजा बहुत कम है, लेकिन फिर भी जहाँ न्‍याय की आस में अदालतों के चक्‍कर लगाते हुए पूरी उम्र गुजर जाती है, वहाँ यह अवधि और अंतत: बिलकिस के पक्ष में हुआ न्‍याय थोड़ी राहत और सुकून तो देता है और इस देश की न्‍याय-व्‍यवस्‍था में हल्‍का-सा यकीन भी। आज से छ: साल पहले गुजरात दंगों के समय 12 hinduo ने मिलकर नारे लगाते हुए एक औरत के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया। उस समय उसके पेट में 6 माह का गर्भ था। वह अकेली नहीं थी, जिसके साथ धर्म के नाम पर यह दिल दहला देने वाला वाकया पेश आया। उसका पूरा परिवार था, जिसकी सभी औरतों के साथ बलात्‍कार हुआ और फिर सभी को मार डाला गया। एक अकेली वही बच गई, वह जीवट वाली औरत, जिसने हार नहीं मानी।

बिलकिस समेत परिवार की अन्‍य महिलाओं के साथ 12 लोगों ने सामूहिक बलात्‍कार किया और फिर उनकी हत्‍या कर दी। बिलकिस किसी तरह जान बचाकर भाग निकली और उसके बाद शुरू हुई यह लड़ाई, न्‍याय पाने का संघर्ष।
एक औरत, एक गरीब औरत और एक मुसलमान औरत होकर पिछड़े सामंती समाज के फिकरों, बलात्‍कार के अपमान को बर्दाश्‍त करना, लेकिन फिर भी गर्व के साथ मस्‍तक ऊँचा किए अपनी लड़ाई से हार न मानना, शायद यही कारण थे कि बिलकिस को अंतत: न्‍याय मिला। एक ऐसे देश में, जहाँ परिवारजन खुद बलात्‍कार का शिकार हुई अपनी बेटी को मौत के घाट उतार देते हैं, वहाँ बिलकिस के मानसिक संत्रास और उसके दु:खों की कल्‍पना की जा सकती है। एक ऐसा देश, ऐसा समाज, जहाँ ‘बैंडिट क्‍वीन’ जैसी बेहद दर्दनाक फिल्‍म के सबसे तकलीफदेह हिस्‍सों पर हॉल में बैठे लोग सीटी बजाते हैं, कनखियों से मुस्‍कुराते हैं। मेरे जेहन में आज भी उस फिल्‍म की स्‍मृति किसी गहरी पीड़ा के रूप में दर्ज है। इस दर्द को बिलकिस कुछ इन शब्‍दों में बयाँ करती है, ‘पिछले छः साल मैंने खौफ के साए में बिताए हैं। एक पनाहगाह से दूसरी पनाहगाह तक भागती फिरी हूँ, अपने बच्चों को अपने साथ लिए-लिए, उस नफरत से बचाने के लिए जो अभी भी मुझे पता है, कई लोगों के दिलोदिमाग में पैबस्त है। इस फैसले का मतलब नफरत का खात्मा नहीं है, लेकिन इससे यह भरोसा जागता है कि कहीं किसी तरह इन्साफ की जीत हो सकती है। यह फैसला सिर्फ़ मेरी नहीं उन सभी बेगुनाह मुसलमानों की जीत है, जिनका कत्ल कर दिया गया और उन सभी औरतों की भी, जिनकी देह इसलिए रौंद डाली गई कि मेरी तरह वे भी मुसलमान थीं।’ और यह सब उस धरती पर हुआ, जो गाँधी की विरासत से सींची गई है। और उस राम और उस धर्म के नाम पर हो रहा है, जिसके धर्मग्रंथ स्‍त्री के महिमामंडन और गौरव-गान से भरे हुए हैं। बिलकिस भंवरी देवी और मुख्‍तारन माई की याद दिलाती है, और इतिहास की उन तमाम स्त्रियों की, जिनमें सच बोलने और सच के लिए लड़ने का साहस है। जिनके फौलादी मन को पिघला सके, इतनी कूवत बड़े-से-बड़े जुल्‍म में भी नहीं है।

Thursday, January 3, 2008

उफ़! मायानगरी में ऐसी इंसानी दरिंदगी


...कोई मेरे पीठ को छू रहा था तो कोई शरीर में चिकोटी काट रहा था। मेरे कपड़े खिंचने के लिए दर्जनों हाथ हमारे करीब आते गए। भीड़ ने मेरी चचेरी ननद पर भी झपटना शुरू कर दिया। हम चिल्ला रहे थे, मेरे पति ने मुझे बचाने का प्रयास किया। उस समय भीड़ केवल चुपचाप खड़ी थी। मुझे लगता है कि मुंबई वासी मुसीबत में पड़े किसी व्यक्ति की मदद करने के इच्छुक नहीं होते। यह दर्दनाक बयान उस महिला के हैं, जो नववर्ष पर मायानगरी में इंसानी दरिंदगी की शिकार हुई। उन दो महिलाओं में से एक ने उस खतरनाक मंजर को बयान किया। किस कदर हुड़दंगियों की भीड़ ने उसे जानवरों की तरह नोचा और शर्मनाक हरकतें की। इस महिला के पति ने उस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना का ब्यौरा दिया, जब करीब 50 लोग उसकी पत्नी और चचेरी बहन को पकड़ने का प्रयास कर रहे थे। एक अखबार को को दिए साक्षात्कार में महिला ने बताया कि मैं इस डरावनी घटना से बाहर निकलने की कोशिश कर रही हूं।

समाज का ये वो रूप है, जहाँ उपभोक्तावाद इंसान की भावनाओं से ऊपर निकल चुका है. कुछ इंसान उपभोक्तावाद की इस अंधी दौड़ में इतना तेज़ दौड़ रहे हैं कि उनको पता ही नही है कि क्या सही है और क्या ग़लत है. मुंबई जैसे महानगर,जिसे भारत की आर्थिक राजधानी भी कहा जाता है और जहाँ पर आज लड़कियाँ भी लड़कों के साथ क़दम से क़दम मिलाकर काम कर रही हैं, ऐसे में मुंबई में हुई ये घटना बताती है कि लड़कियों के लिए कुछ मुट्ठी भर लोगो कीं सोच आज भी क्या है. जो लोग ऐसी हरकतें करते हैं वो ये भूल जाते हैं कि उनके घर में भी माँ, बेटी और बहन हैं.