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Saturday, October 18, 2008

जिंदगी फिर दोराहे पर लाकर खड़ा कर चुकी है


शामली नाम है उस लड़की का, नाम के अनुसार प्यारी सी गुड़िया..मगर वक्त और हालात ने उसकी मासूमियत को बिखेर कर रख दिया। नोएडा के एक पार्क बैठे हुए अचानक एक दिन वो मुझसे मिली। हाय..हेलो के बाद दोस्ती हुई। फिर एक दिन मैंने उसके जिंदगी के कुछ लम्हों को कुरेदा..फिर तो उसकी वो हंसी भी गायब हो गई, जो यदा-कदा मुझे दिख जाती थी। आज उसने मुझे एक पोस्ट भेजा। उस पोस्ट को उसी के शब्दों में प्रकाशित कर रहा हूं।
.....ट्रेन का लंबा सफर और मैं बिल्कुल अकेली बैठी खिड़कियों से बाहर टकटकी लगाए उन तेजी से पीछे भागते पेड़ों को निहारे जा रही थी। शायद मैं उन्हें देखकर भी नहीं देख पा रही थी, क्योंकि मैं वहां मौजूद जरूर थी पर वहां थी नहीं। जैसे मानो सब कुछ तो वहीं ठहरा है बस बदली है तो चंद समय की घडि़यां, जब मैं चली तो तीन साल पहले का समय था और आज तीन साल गुजर चुके फिर भी सब कुछ ज्यों का त्यों ही है। अचानक उसे वो गुजरे अनगिनत लम्हें याद आने लगे जिसमें खुशी से ज्यादा थी गमों की रेखाएं। जून 2005 मेरी बीकाम का रिजल्ट आ चुका था और घर में सभी लोग काफी खुश थे। मैं अच्छे अंको से परीक्षा जो उत्तीर्ण की थी। मम्मी पापा और अपने पूरे परिवार की लाडली मैं दिनभर घर में इधर से उधर उछलती कूदती रहती, कभी भैया से नोकझोंक, तो कभी भाभी से इठलाती और कभी अपने प्यारे-प्यारे भतीजे को खिलाती। घर में इतनी लाडली थी कि कोई कभी कुछ कहता ही नहीं था। पापा ने भी एकबार भी नहीं पूछा कि बेटा तुम एमकाम क्यूं नहीं करना चाहती? शायद यह उनके स्वभाव में ही शामिल नहीं था बच्चे जो करना चाहे करें बस उन्हें पैसे देने से मतलब होता था। एमकाम के फार्म की अंतिम तारिख भी गुजर गई और पापा ने एक बार फिर भी नहीं पूछा। पर मैं जानती थी कि पापा के मन में कुछ और है।उसके सपनों की उड़ान अभी बाकि थी। और कुछ ही समय घर में अभी बीते होंगे कि रिश्तेदार और पड़ोसियों की आंखों में जैसे मैं किरकिरी की तरह चुभने लगी। कब कर रहें हैं शादी, कोई लड़का देखा कि नहीं। आखिर आपको कैसे लड़के की तलाश है। कब करेंगे शादी, न जाने कितने सवाल, पर मेरी मम्मी और पापा का एक जवाब-- हमें अपनी बेटी को किसी की दासी बनाकर नहीं बिदा करना हम जब तक उसे अपने पैरों पर न खड़ा कर ले नहीं बिदा करना। सौ सवाल के एक जवाब ने कर दिया सभी को खामोश। आखिर हो भी क्यों न, मेरी दो बहनों के साथ जैसा हुआ सभी वाकिफ थे। बड़ी दीदी एक घरेलू महिला थीं जिन्हें उनके ससुराल वालों ने कितने दुख दिए, शायद वो दर्द इतने थे कि कोई भी लड़की शादी के नाम पर नफरत करने लगती और कुछ ऐसा ही हुआ शामिली के साथ भी और मैं भी शादी जैसे पवित्र बंधन से नफरत करने लगी मुझे लगता था कि जहां प्रेम न हो ऐसी शादी का क्या अर्थ और क्या मायने जिसके लिए अपना घर परिवार सबकुछ छोड़कर एक लड़की जाती है वो ही उसे वो मान सम्मान, प्रेम और अधिकार की बजाय उसपर कहर बरसाए तो आखिर वो कहां जाए। मां बाप की भी मजबूरी, कि लड़की पराया धन है उसे जब शादी के पहले नहीं रख सकते तो फिर शादी के बाद रखना तो जैसे समाज के नियम कानूनों को तोड़ना जितना अक्षम्य अपराध ही होगा। फिर भी दी ने किसी तरह नौ महीने अपनी मासूम सी बेटी के साथ गुजारे। हर पल तिल-तिल जलती और मरती रही वो और समाज था कि ताने पर ताने कसता रहा। वो इंसान कैसा था जो अपनी मासूम सी फूल सी बेटी को एक झलक देखने के बाद दोबारा कभी नहीं आया। कितना भी कोई बेरहम हो पर इतना नहीं हो सकता, जिस फूल को देखकर पत्थर भी पिघल जाता पर ये दहेज का भूखा इंसान नहीं पिघल रहा था। पर शायद उसमें इंसानियत ही नहीं थी.....दिल पर गहरी चोट दे गया था वो हादसा जो कभी न भरे शायद ऐसे जख्म थे।....और फिर मेरी दिल में भी आत्मनिर्भर बनने की महत्वाकांक्षा हिलोरे मार रही थी। उस पर से मम्मी पापा का पूरा-पूरा सहयोग मिला। पापा मैं अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हूं मैं अपने जीवन में किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती। शादी तो जिंदगी का अंत है पर मैं जिंदगी की शुरूआत करना चाहती हूं, मैं ऐसे क्षेत्र में जाना चाहती हूं जहां मैं kisi के दर्द को बांट सकूं, लोगों तक उसकी दर्द भरी आह को पहुंचा सकूं। शायद जिंदगी में अब तक जो देखा वो काफी है, फिर कभी किसी के साथ कोई अन्याय न हो। कुछ ऐसे ही सपने थे शामिली के जो उसे जिंदगी में कुछ करने को हर पल मजबूर करते थे। लेकिन इसके लिए अपनों से दूर जाना होगा। मुश्किल था शामिली के लिए, अपने परिवार से दूर रहना, वह एक दिन भी मम्मी के बिना नहीं रह पाती थी। रिश्तेदारों ने तो टकटकी लगाई थी कि कैसे रहेगी शामिली, घर से दूर। आखिर उसके सपनों के आगे परिवार का प्रेम छोटा पड़ गया और निकल पड़ी मैं घर से कुछ करने की लालसा में.... आसान न थी डगर पर फिर भी था चलने का हौसला और जिंदगी में कुछ करने की ख्वाइश। हर पल जिंदगी कुछ नए ताने बाने बुनती और कहती कि कुछ कर गुजरना है। इस बीच भी लोगों के खोखले सवाल पीछा ही करते थे। कभी दबी जुबान में बाहर भी आ जाते लेकिन अभी उसे पता था कि उसका लक्ष्य उसके सामने है उसे कुछ ऐसा करना है जो दुनिया की भीड़ से उसे अलग कर दे। देखते देखते एक और साल गुजरा और दिल्ली में उसकी पढ़ाई भी खत्म हो गई। फिर उठे वही सवाल अब नहीं करवानी नौकरी कर दो इसकी शादी, नहीं तो भेज दो वापस घर। अब तो अति हो गई जब मेरे घर वालों को मेरी नौकरी से परहेज नहीं तो गैरो को क्यूं हो भला। आंशू के साथ जिंदगी ने फिर चुना एक पथरीला रास्ता छोड़ दिया सब कुछ और निकल पड़ी अपनों से बहुत दूर किसी दूसरे प्रांत में जहां कोई उससे ऐसे बेतुके सवाल न करें और न मांगे उससे भविष्य का हिसाब। अब मैं पहले से बहुत खुश और सकून भरी जिंदगी जी रही थी क्योंकि अब मेरी जिंदगी का वो सपना साकार हो चुका था और मम्मी पापा की भी तपस्या रंग लाई थी। धीरे-धीरे एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला जैसे पर अब इस समाज में भी जहां मैं रह रही थी लोगों को वही सारी समस्याएं दिखने लगी। समाज की अपेछाएं वक्त के साथ बढ़ने लगी, लेकिन मेरी दिलों के जख्म को देखने और समझने वाला कोई नहीं था। क्यूं होती है उसे इस समाज के नुमाइंदों से नफरत शायद अब तक तो मैं भी उन्हें भुला ही चुकी थी। पर वक्त और लोगों के व्यवहारों ने फिर मुझे कुरेदना शुरू कर दिया था। एक बार फिर मुझे याद दिला दी कि कैसे जिए। आखिर कैसे बीते थे ये दो साल? अक्सर याद आती थी उस बचपन की जहां कुछ कहने से पहले ही सबकुछ मिल जाता। घर का लाड प्यार सबकुछ पर फिर सपने सब भुला देते हैं। कहीं रहने के लिए वहां दिल का लगना बहुत जरूरी है, और शायद वहां बने मित्रों के साथ दिल भी लग गया था। अचानक फिर ली जिंदगी ने एक नई करवट और एक ही दिन में उस ट्रेन के सफर की तरह मेरी जिंदगी ने रास्ता बदल दिया और छूट गए वो सारे पुराने साथी जिसकी मंजिल जहां आई वो वहीं उतर गया। शामिली का मन अब उदास सा रहना लगा, फिर नए लोग और नई दुनिया लेकिन समझने वाला कोई नहीं। धीरे-धीरे मेरी दुनिया का सामना करने की ताकत भी खत्म होने लगी। कैसे कहे कि आज मुझे वो गुजरे जमाने याद आने लगे, जिन सपनों के लिए मैं ne सबकुछ छोड़ा था वो भी अब मुझे पराए से लगने लगे। डूब सी गई वो अपनी पुरानी यादों में, साहस था कि मधम पड़ने लगा। मैं शादी नहीं करना चाहती थी पर समाज और रिश्तेदारों की जोर जर्बदस्ती मुझे कमजोर कर रही थी। जिंदगी फिर एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर चुकी है......मेरी

Thursday, October 9, 2008

..तो बिन सात फेरे ही होंगे हम तेरे



भाइयों और भाभियों, लिव इन रिलेशनशिप में रहने वालों के लिए एक बहुत ही अच्छी खबर है। अगर महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव पास हो गया तो फिर [कथित रूप से कुंवारे या शादीशुदा] युवक-युवतियों को बिंदास साथ-साथ रहने से कोई नहीं रोक सकता। मगर, भाई लोगों क्या यह उचित होगा? जरा कल्पना करें-अगर ऐसा हो गया तो फिर शादी जैसे पवित्र बंधन का क्या औचित्य रह जाएगा? पति-पत्नी के संवेदनशील रिश्ते कहां जाएंगे। तब शायद सामाजिक पतन की पराकाष्ठा होगी और सात फेरों का बंधन व पति-पत्नी का पवित्र रिश्ता गर्त में जाने लगेगा। कम से कम महाराष्ट्र सरकार ने तो इसका श्रीगणोश कर ही दिया है।जी हां, महाराष्ट्र विधानसभा ने लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी जामा पहनाने के लिए एक प्रस्ताव को मंजूरी दी है। यह प्रस्ताव जस्टिस मल्लीमथ कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि अगर पुरुष और महिला एक उचित अवधि से एक दूसरे के साथ रह रहे है तो उन्हें एक दूसरे को शादीशुदा पति-पत्नी की तरह समझना चाहिए। यानी बिना शादी किए साथ-साथ रहने वाले युवक-युवती भी पति पत्नी का दर्जा पा सकते है। साथ ही साथ इससे बहु पत्नी प्रथा को भी बढ़ावा मिलेगा। मतलब साफ है बिन सात फेरे ही हम होंगे तेरे। फिलहाल को महाराष्ट्र विधानसभा का यह फैसला केंद्र के पास विचाराधीन भेज दिया गया है, परंतु महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले ने एक बहुत बड़े विवाद को जन्म दे दिया है।

Monday, September 29, 2008

..तो अपराध है समलैंगिक यौन संबंध


समलैंगिकता कानून पर कोर्ट में किरकिरी का सामना कर रही सरकार को आखिरकार अपने ही मंत्री के खिलाफ हाईकोर्ट में बोलना पड़ा।सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास के रजामंद वयस्कों में समलैंगिक यौन संबंध की अनुमति संबंधी दृष्टिकोण को खारिज करने को कहा है।यानी सरकार के इस केंद्रीय मंत्री का बयान कोई मायने नहीं रखता। जैसा कि पिछले दिनों स्वास्थ्य मंत्रालय ने समलैंगिक यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर निकालने की वकालत की थी, मगर गृह मंत्रालय ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि ऐसे कृत्यों के बारे में दंड के प्रावधानों को हटाया नहीं जा सकता। परिणाम स्वरूप दिल्ली हाईकोर्ट ने भी समलैंगिक यौन संबंध को मान्यता देने की मांग करने वाली याचिका खारिज कर दी थी।अब सवाल यह उठता है कि इस मर्ज का इलाज क्या है। विश्व में किसी भी देश से ज्यादा एड्स रोगी भारत में है। मेरे विचार से समाज में सेक्स से जुड़े विभिन्न पहलुओं को जब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब तक इस मर्ज का कोई इलाज नहीं है। आखिर समलैंगिक यौन संबंध जिसे हमारे कानून ने अप्राकृतिक यौन संबंधों की श्रेणी में रखा है, का कितना औचित्य है। चोरी छिपे ही सही, मगर समलैंगिक यौन संबंध तो तकरीबन हर जगह है।

Friday, September 26, 2008

आतंकियों का एक और प्रवक्ता अर्जुन सिंह


यह लो भाइयों, आतंकियों का एक और प्रवक्ता सामने आया। यह प्रवक्ता है हमारे देश का बुजुर्ग केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह।अब तो लगता है देश के गद्दारों और अमन के दुश्मनों पर लगाम लगना बहुत ही मुश्किल है। इस केंद्रीय मंत्री ने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के कुलपति के दिल्ली बम विस्फोटों के मामले में आरोपी दो छात्रों को कानूनी सहायता देने के फैसले का खुलकर समर्थन किया है। मामला साफ है, सरकारी पैसे का खुलेआम दुरुपयोग, वह भी अमन के दुश्मनों और देश को तबाह करने का मंसूबा रखने वाले आतंकियों के लिए।जामिया विश्वविद्यालय का कुलपति प्रो. मुशरुल हसन ने कल ही एक राष्ट्र विरोधी और बेहद आपत्तिजनक फैसला लेते हुए कहा था कि वह पकड़े गए आतंकियों को कानूनी सहायता देगा। कहां हम सरकार से अपेक्षा कर रहे थे कि वो इस आपत्तिजनक फैसले पर विरोध जताते हुए इस संदिग्ध कुलपति से इस्तीफा ले लेगी, मगर आश्चर्यजनक तरीके से सरकार के एक जिम्मेवार मंत्री ने राष्ट्र विरोधियों का समर्थन कर दिया। तो क्या दिल्ली पुलिस के उस जाबांज सिपाही मोहन चंद्र शर्मा की शहादत को कोई मोल नहीं है, इस निकम्मी सरकार के लिए। यह चिंतनीय विषय है।फिर यह सरकार क्यों बेवजह मोहन चंद्र शर्मा जैसे लोगों की हत्याएं करवा रही है। अगर आतंकियों से इतना ही प्यार है अर्जुन सिंह और मुशरुल हसन को तो देश को खुल कर क्यों नहीं बताते। फिर देखते ऐसे लोगों को जनता किस तरह सबक सिखाती।

Tuesday, September 23, 2008

..तो दस बार सोचेंगे विदेशी निवेशक


भारतीय उद्योग जगत को शर्मसार कर देने वाली एक और खबर। सिंगूर में टाटा प्लांट के गार्डो पर लोहे की राड से हमला किया गया। वह भी ऐसे समय में जब कि टाटा दु:खी मन से अपने नैनो परियोजना का काम चुपचाप स्थानांतरित कर रही है। इससे ठीक एक दिन पहले दिल्ली से सटे औद्योगिक नगर ग्रेटर नोएडा में ग्रेजियानो ट्रांसमिशन इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी के कुछ गुंडे टाइप कर्मचारियों ने कंपनी के सीईओ को लाठियों से पीट-पीट कर मार डाला। इस दोनों घटनाओं में काफी समानता है। ग्रेटर नोएडा की घटना तो स्थानीय पुलिस की लापरवाही दर्शाती है वहींसिंगूर में पिछले एक साल से जो हो रहा है वह विशुद्ध रूप से राजनीति का एक गंदा स्वरूप है।
बहरहाल, ये घटनाएं देश की उद्योग नीति की कमजोरियों को दर्शाती है तथा ऐसी घटनाएं विदेशी निवेशकों के समक्ष भारत की छवि को धूमिल ही करेंगी। खास कर देश के श्रम मंत्री ऑस्कर फर्र्नाडिस का वह बयान को विदेशी निवेशकों को दस बार सोचने पर मजबूर कर देगा, जिसमें उन्होंने सीईओ की हत्या के बाद कहा था कि यह हत्या कंपनियों के प्रबंधकों को एक चेतावनी है। मतलब साफ है-कंपनिया निकम्मे कर्मचारियों को भी पाल कर रखे। उन्हें निकालेंगे को यही होगा। वाह रे हमारे देश के श्रम मंत्री।

Monday, September 22, 2008

शर्मसार हुआ भारतीय उद्योग जगत

भारतीय उद्योग जगत को शर्मसार कर देने वाली एक घटना घटी। ग्रेजियानो ट्रांसमिशन इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी के कुछ गुंडे टाइप कर्मचारियों ने कंपनी के सीईओ को लाठियों से पीट-पीट कर मार डाला। इस घटना ने भारतीय उद्योग जगत का चेहरा दुनिया में शर्मसार किया है। अगर किसी कारखाने में व्यवस्था और कामगारों के बीच हाथापायी भी हो जाए तो ये उस देश की उद्योग नीति की कमजोरी को उजागर कर देती है परन्तु यहां तो उन गुंडे टाइप कर्मचारियों ने अपने ही रोजगारदाता कंपनी के सीईओ को पीट-पीट कर मार डाला , इस घटना से विश्व में भारतीय उद्योग की निंदा जरूर होगी। अब कोई भी बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में उद्योग स्थापित करने से पहले जरूर सोचेगी और शायद हिचकिचाए भी। इससे पहले सिंगुर-विवाद ने भी एक बहुत ग़लत प्रभाव छोड़ा था और अब ये ज्वलंत मामला। क्या हमारे देश में उद्योगों के लिए कोई व्यवथित नियम नहीं है कि आम जनता को हर समय नियम और कानून अपने हाथों में लेना पड़ता है। सीईओ एलके.चौधरी ने तो बस अपने शीर्ष प्रशासन के हुक्म पर अमल किया होगा और उसे अपनी जान से हाथ धोनी पडी। आख़िर कामगारों के अत्यधिक गुस्से का कारण इतना आसान नहीं हो सकता, कहीं न कहीं प्रशासन भी गुनाहगार है । उधर, कंपनी के प्रॉडक्शन सुपरवाइज़र राजपाल ने आरोप लगाया कि सूचना के दो घंटे बाद बिसरख पुलिस मौके पर पहुंची। इतना ही नहीं , बिसरख थाना इंचार्ज जगमोहन शर्मा सीनियर अफसरों को इस घटना को मामूली मारपीट बताते रहे और उन्हें कई घंटे तक अंधेरे में रखा। इस घटना का एक पहलू और भी है, जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए, क्या इन नीजी कंपनियों के लिए कोई पक्के नियम और क़ानून नहीं है सरकार की ओर से जो ये अपनी मनमानी करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो ये सीईओ की मौत सरकार को एक चेतावनी है कि नीजी उद्योगों में हस्तक्षेप करे। आख़िर उस मुनाफा का किसी को क्या लाभ जिसमें जान ही चली जाए। साथ ही साथ इस घटना की कड़ी निंदा होनी चाहिए और दोषी गुंडे टाइप कर्मचारियों को उचित दंड भी मिलना चाहिए जिससे उद्योग जगत के अनुशासन तोड़ने वालों को भी सरकार की ओर से चेतावनी मिल सके।

Saturday, September 20, 2008

क्या प्यार करना बड़ा गुनाह है...


क्या प्यार करना इतना बड़ा गुनाह है॥कि उसके बदले कोई अपना ही उसे निर्ममता पूर्वक मार डाले? बचपन से ही तो हर बच्चों को प्रेम करना सिखाया जाता है, जब वे बड़े होकर उसी प्यार के साथ जीने का निर्णय लेना चाहते है तो फिर हमारा समाज उसका दुश्मन क्यों हो जाता है? ग्रेटर नोएडा के एक गांव की घटना इसकी मिसाल है। वहां 18 साल की एक लड़की और उसके प्रेमी को इसलिए मार डाला गया, क्योंकि वे एक ही जाति के होने के बावजूद विभिन्न आयवर्ग में आते थे। एक परिवार रईस, दूसरा बेहद गरीब। दोनों परिवारों को अपने युवा होते बच्चों का प्रेम बर्दाश्त नहीं हुआ। इस पर ऐसा वहशीपन दिखाया गया कि दोनों को न सिर्फ पीट-पीटकर मार डाला गया, बल्कि उन्हें आग के हवाले भी किया गया। हमारे देश में यह पहली घटना नहीं है। जाति और समाज के नाम पर झूठी शान कायम रखने की जिद के चलते कितने ही प्रेमियों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। कई बार तो बाकायदा पंचायत बुलाकर युवा प्रेमियों की हत्या का फरमान जारी किया जाता रहा है। ऐसी घटनाएं गांवों में ही ज्यादा हो रही हैं। अंतर्जातीय शादियों को लेकर शहरों में तो नजरिया काफी बदला है, वहां अब अभिभावक अपने बच्चों के ऐसे प्रेम और विवाह के प्रति उदार हुए हैं, पर ग्रामीण इलाकों में हालात पहले की तरह ही हैं। वहां सामंतवादी रूढि़यां अभी भी जस की तस कायम हैं। वहां संपन्नता, तो पहुंची है पर समझ की वह रोशनी नहीं पहुंची, जो वहां के समाज को ऐसे मामलों में उदार बनाती है। वहां आज भी अलग जाति-वर्ग के युवाओं के प्रेम को अत्यधिक चिढ़ के साथ देखा जाता है और उसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया जाता है। झूठी प्रतिष्ठा का सवाल न जाने और कितने प्रेमियों की जान ले लेगा। आखिर कब बदलेगी ऐसी प्रवृति? कब रुकेगा यह वहशीपन?